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Amoghvarsha


यदि हम भारतीय इतिहास पर दृष्टिपात करे तो हम पाएंगे कि जैन धर्म को विभिन्न राजवंशों , सामंतों और व्यापारियों ने अनुसरण किया परन्तु भारतीय इतिहास में कुछ सम्राट ऐसे है कि जिन्होंने ना केवल जैन धर्म को संरक्षण दिया वरन अपने भुज विक्रम से अपने साम्राज्य की सीमाओं को आधुनिक भारत की सीमाओं के पार ले गये. अजातशत्रु , बिंबसार , चन्द्रगुप्त मौर्या , सम्प्रति , खारवेल ,अमोघवर्ष, कुमारपाल और भी कई नाम इस श्रेणी में आते है. अमोघवर्ष प्रथम राष्ट्रकूट वंश के 6 ठे प्रतापी सम्राट थे जिनके साम्राज्य की सीमायें उत्तर में गुजरात और दक्षिण में कर्नाटक में फैली हुई थी। महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश भी इनके ही साम्राज्य का हिस्सा थे. सम्राट अमोघवर्ष को इतिहास में नृपतुंगा , रट्टामार्तण्ड , वीरा नारायणा और आतिशधवला जैसी उपाधियों से सम्मानित किया गया है. सम्राट अमोघवर्ष एक जैन अनुयायी थे जो ह्रदय से कवि और वीरता में एक अभूतपूर्व योद्धा थे. सम्राट अमोघवर्ष का जन्म 800 ईस्वी सं में हुआ उनके पिता का नाम गोविंदा तृतीय था जो के राष्ट्रकूट वंश के एक प्रतापी शासक थे. सम्राट गोविंदा तृतीय की मृत्यु के उपरान्त सम्राट अमोघवर्ष ने 814 ईस्वी में राज गद्दी को संभाला। यद्यपि सम्राट अमोघवर्ष उस समय 14 वर्ष के थे जब सिंहासनारूढ़ हुए परन्तु उनके चचेरे भाई सुवर्णवर्ष ने उनके मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। सुवर्णवर्ष गुजरात के शासक थे जिसने सम्राट अमोघवर्ष के साथ मिलकर कई विद्रोहों को दबाया और अपना राज्य अक्षुण्ण रखा. सम्राट अमोघवर्ष ने 64 वर्षों तक 878 ईस्वी तक राज्य किया. सम्राट अमोघवर्ष ने अपनी राजधानी के मयूरखंडी से बदलकर मान्यखेट कर दिया. मयूरखण्डी आज के कर्णाटक के बीदर जिले में स्थित है और मान्यखेट को आज मलखेड के नाम से जाना जाता है जो कर्नाटक के गुलबर्गा जिले में स्थित है. सम्राट अमोघवर्ष की पत्नी का नाम आसगव्वे था और संभवतः वह पल्लव राजकुमारी थी. सम्राट अमोघवर्ष ने पश्चिम गंगा शासकों और वेंगी के चालुक्यों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये. चालुक्य शासक विजयादित्य द्वितीय के पुत्र विष्णुवर्धन पंचम के साथ अपनी चचेरी बहिन का विवाह करवाया। सम्राट अमोघवर्ष ने चालुक्य शासक विष्णुवर्धन पंचम को हराकर वीर नारायणा की उपाधि प्राप्त की। सम्राट अमोघवर्ष ने अपनी पुत्री चन्द्रवल्लभे का विवाह गंगा शासक बुथुगा और अन्य पुत्री रेवकनिम्मादि का विवाह राजकुमार एरेगंगा के साथ करवाया। अरबी यात्री सुलेमान जो के अमोघवर्ष के राज्य के दौरान भारत भ्रमण पर आया उसने सम्राट अमोघवर्ष की गणना विश्व के 4 महानतम शासकों में की है. अन्य नाम बग़दाद के खलीफा, कोंस्तांतिनपोल और चीन के शासक के है. प्रसिद्ध इतिहासकार R. S. पंचमुखी ने अमोघवर्ष की तुलना सम्राट अशोक से की है और धार्मिक सहिष्णुता और शांति की नीतियों से अमोघवर्ष को "दक्षिण का अशोक " कहा गया है। जैन धर्म को योगदान :- कुछ स्थानों पर पाये गए शिलालेखों और प्लेटों से यह बात सर्वमान्य सिद्ध है कि सम्राट अमोघवर्ष जैन धर्म के अनुयायी और संरक्षण दाता थे. इनके आध्यात्मिक गुरु का नाम आचार्य जिनसेन था जो कि प्रसिद्ध जैन पुराण महापुराण के रचयिता है. जिनसेन के गुरु का नाम वीरसेन था जिन्होंने धवला महाग्रंथ की टीका की थी. यह टीका आचार्य जिनसेन ने पूर्ण की थी. गुणभद्र जो के जिनसेन के शिष्य थे उन्होंने महापुराण के उत्तरपुराण और आदिपुराण को पूर्ण किया था। सम्राट अमोघवर्ष ने स्वयं कन्नड़ भाषा में "कविराजमार्ग " का लेखन किया था जो के कन्नड़ साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है. जैन आचार्य और गणितज्ञ महावीराचार्य ने भी इसी काल में "गणित सार संग्रह " की रचना की। सम्राट अमोघवर्ष ने संस्कृत भाषा में "प्रश्नोत्तर रत्नमालिका " की रचना की जो के जैन सिद्धांतों का निरूपण करती है. कई विद्वान इस कृति को आदि शंकरचार्य और विमलाचार्य की बताते है परन्तु विद्वान रेऊ के अनुसार गुणभद्र के "महापुराण" , "प्रश्नोत्तर रत्नमालिका" और महावीराचार्य के "गणित सार संग्रह " से यह सिद्ध होता है कि अमोघवर्ष जैन धर्म का संरक्षक और अनुयायी थे. पट्टकदल का जैन नारायणा मंदिर , कोन्नुर की जैन बसदि और मलखेड (मान्यखेट ) की नेमीनाथ बसदि का निर्माण सम्राट अमोघवर्ष के शासनकाल में हुआ.

Although Jainism had been followed by several Monarchs,Noblemen and businessmen in Indian history but some monarchs are very famous in history.Amoghvarsha I is a one name of those emperors who not only follow Jainism but also spread their empire till modern Indian territories.Amoghvarsha I was a great rashtrakuta emperor who ruled over modern Karnataka, Andhra ,Maharashtra and partially on gujarat. He was 6 th emperor of his rashtrakuta dynasty.He was a zealous follower of Jainism,a poet by choice and warrior by necessity. Emperor amoghvarsha was born in 800 AD as Sharva to Govinda III . His father was a also great monarch of Rashtrakuta dynasty. he ascended to the throne in 814 AD after death of his father when he was just 14 years old. Initially his cousin Karka suvarnavarsha emperor of Gujarat was his guardian. He along with his cousin suppressed many rebels against his monarchy.He reigned about 64 years till 878 AD. He moved his regal capital to Manykhet (Malkhed) from Mayurkhandi.He established his capital to Manyakhet which is situated in modern gulberga district of Karnataka state.His wife's name was Asagavve. He established marital relations with Eastern chalukyas as well as western gangas. He gave his cousin to Vijayaditya II 's son Vishnuvardhan V. He gave in marriage his daughter, Chandrabbalabbe, to the Western Ganga King Buthuga, and another daughter, Revakanimmadi, to prince Ereganga.Arab visitor Sulaimaan who came to India during reign of Amoghvarsha remarked him as one of top 4 emperors of the world. The other three were constantinpole, Khalifa of Baghdad and emperor of China.He was very impressed with Amoghvarsha. Senior Historian R.S. Panchamukhi has compared him to the legendary Emperor Ashoka for his religious temperament and love of peace. He called him "Asoka of south". Contribution to Jainism :- according to some plates and inscriptions It is well attested that Amoghvarsha was zealous follower of Jainism. His Spiritual preacher's name was acharya jinsena. As we known that Acharya Jinsena who composed Uttarpuran and Adipuran.Jinsena completed commentry on Dhavala initiated by his preacher Virasena. Gunbhadra pupil of Jinsena was also worshiped by amoghvarsha. Amoghvarsha also composed kavirajamarga in kannada language.This is one of earliest literary work in kannada. Besides this, amoghvarsha also composed "Prassanottar Ratnamalika" in sanskrit regarding doctrine of Jaina creed. Mahaveeracharya a great mathematician and a Jain monk wrote ganit sara sangrah in his reign.Some scholar doubted that "Prassanottar Ratnamalika " is not composed by Amoghvarsha but it was composed by Adi Shankara or Vimalacharya.However, according to the scholar Reu, writings such as Mahapurana by Gunabhadra, Prashnottara Ratnamalika and Mahaviracharya's Ganita-sara-sangraha are evidence that Amoghavarsha had taken to Jainism.The Jain Narayana temple of Pattadakal, (a UNESCO World Heritage Site) a basadi at Konnur and the Neminatha Basadi at Manyakheta were built during his rule.During his rule he held such titles as Nrupathunga, Atishadhavala, Veeranarayana, Rattamarthanda and Srivallabha.


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