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Chavundraya

About Chavundraya:

Medieval karnataka's history cant be completed without illustration of Western ganga kings. These western ganga emperors were also known as gangas of Talakkad who were devout followers of Jainism .Western gangs monarchs reigned over modern Karnataka and Andhra region during third century to tenth century AD. Western ganga king's empire spread in between territories of eastern chalukya, rashtrakutas and pallavs.Western gangas were chieftains and feudatories kings of Rashtrakutas dynasty in later centuries of existence. Chavundraya :- Chavundraya was great chieftain general and minister of Ganga king Rachmalla IV. He was a poet, valour warrior and devout of Jainism.He is renowned personality with versatile talent in western ganga history.In 982 he commissioned the Gomateshwara, a monolithic sculpture in Shravanabelagola, an important place of pilgrimage for Jains. He was a devotee of the Jain Acharya Nemichandra and Ajitasena Bhattaraka and was an influential person during the reign of Kings Marasimha II, Rachamalla IV, and Rachamalla V (Rakkasa Ganga). Chavundraya was born in 940 AD. His father Mahabalayya and grandfather Govindamayya were trusted servants of the royal family and had served with great distinction under Marasimha. after sallekhana of great rashtrakuta emperor Indra IV at Shravan belagola. Rashtrakuta's dynasty was no longer in existence. Feudatory king's and chieftains proclaimed themselves as paramount sovereign. After death of Marsimha , Panchal deva mahasamnta proclaimed himself as sovereign king of puligere region. One another chieftain named mudurachayya also rebel against ganga monrch. In 975 AD Chavundraya suppressed rebellion of panchaldeva mahasamanta. He was encountered by western ganga's general Chavundraya. An another usurper named Mudurachayya was slain by Chavundraya in the battle of Bageyur and avenged his brother Nagvarma's death. Mudurachayya had slain chavundraya's younger brother Nagvarma earlier and held the titles of "Chaladanka Ganga" and "gangarabanta". In this way he earned the title of "Samara Parsurama". After a great valour and personal gallantry in the battlefield Chavundraya made accession of Rachamalla IV on throne.He killed Prabhuvanavira in the battle of Bayelur and enabled Govindaraja to enter the fortress which he took after a protracted siege. He punished Raja, Basa, Sivara, Kunanka and other chiefs who showed signs of insubordination and attempted at alienation from Ganga rule. For this great distinction in the field of battle and service to the king he earned the titles of Vira Martanda, Ranarangasimha, Samara Dhurandhara, Vairikula Kaladanda, Bhuja Vikrama and Bhatamara. Though a great warrior and statesman he loved scholarship and spent his leisure in the society of learned men. He was well versed in logic, grammar, mathematics, medicine and literature. He himself composed chavundraya puran in kannada language. This is considered one of the earliest masterpiece of kannada literature. He was the contemporary of Pampa the author of Adipurana.His puranam has been considered to be a great work of "the southern school" with a lot of admixture of Prakrit and Tamil words. Chaundaraya was a great scholar profoundly learned in Kannada,' Sanskrit and prakrit. He was the contemporary of Pampa the author of Adipurana. From Chaundaraya Purana we learn that he was a devout Jain and that his guru was Ajitasena the same great saint before whom Marasimha performed Sallekhana at Bankapur.He earned the title of Raya from Rachamalla IV for founding the Gomata Image in Sravanabelgola. His son Jinadeva constructed a dravidian style Jaina temple on chandragiri hill to commemorate his father Chavundraya. This temple is known as Chavundraya Basti .So long as Chaundaraya was the minister, foreign aggression was successfully prevented and the integrity of Ganga' dominion was preserved. With his death, departed the cohesion and power of the Ganga kingdom.

मध्य युगीन कर्नाटक का इतिहास पश्चिम गंगा शासकों के उल्लेख के बिना सम्पूर्ण नहीं हो सकता है. ये पश्चिम गंगा शासक तलक्काड़ के गंगा शासकों के नाम से भी जाने जाते है जो कि जैन धर्म के संरक्षक और अनुयायी थे. पश्चिम गंगा शासकों ने आधुनिक कर्नाटक और आंध्र राज्यों पर तीसरी शताब्दी से दसवी शताब्दी तक शासन किया। पश्चिम गंगा शासकों का साम्राज्य वेंगी के चालुक्यों, राष्ट्रकूटों और पल्लव साम्राज्यों के मध्य में विस्तारित था. पश्चिम गंगा शासक राष्ट्रकूट शासकों के अधीनस्थ शासन चलाते थे. चामुण्डराय :- चामुण्डराय पश्चिम गंगा शासक राजमल्ला चतुर्थ के सेनापति और मंत्री थे। चामुण्डराय बहुमुँखी प्रतिभा के धनी थे ; ये एक महान कवि और योद्धा थे। सेनापति चामुण्डराय ने ना केवल जैन धर्म को संरक्षण दिया अपितु जैन धर्म का पालन कर इसे राज्य धर्म के रूप में स्थापित किया. सं 982 ईस्वी में चामुण्डराय ने गोम्मटेश्वर की 57 फ़ीट उतुंग प्रतिमा को श्रवणबेलगोला के इन्द्रगिरी पर्वत पर प्रतिष्ठापित किया. श्रवणबेलगोला जैनों का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है जो कि आधुनिक कर्नाटक के हासन जिले में स्थित है. चामुण्डराय जैन आचार्य नेमिचन्द्र और अजीतसेन भट्टारक के शिष्य थे और मारसिम्हा द्वितीय , राजमल्ला चतुर्थ और राजमल्ला पंचम के शासन में प्रभावशाली व्यक्तित्व थे। चामुण्डराय का जन्म ईस्वी सं 940 में हुआ और इनके पिता महाबलय्या और दादा गोविन्दमय्या मारसिम्हा द्वितीय के स्वामिभक्त व्यक्तियों में शामिल थे और इन्होने अपनी विशेष योग्यता से शाही दरबार में अपना स्थान बनाया था। अंतिम राष्ट्रकूट शासक इंद्र चतुर्थ के सल्लेखना पूर्वक श्रवणबेलगोला में मरण के पश्चात राष्ट्रकूट शासन का अंत हो गया और अधीनस्थ सामंतो और सेनापतियों ने अपने आप को सम्प्रभु शासक घोषित कर लिया. शासक मारसिम्हा द्वितीय के बंकापुर में भट्टारक अजीतसेन के सामने सल्लेखना पूर्वक मरण के पश्चात गंगा अधीनस्थ सामंतों में भी विद्रोह फैल गया। पांचालदेवा महासामंत ने अपने आप को पुलिगेरे क्षेत्र का सम्प्रभु शासक घोषित कर लिया और साथ ही साथ 974- 975 ईस्वी में स्वतंत्र शासन चलाया। एक अन्य सामंत मूडुचराइया ने भी गंगा शासन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। सं 975 ईस्वी में चामुण्डराय ने पंचालदेवा महासामंत को युद्ध क्षेत्र में पराजित किया। पंचालदेवा महासमंता इस युद्ध में मारा गया. इसी प्रकार मूडुचराइया का बागेयुर के युद्ध में अंत किया। मूडुचराइया ने पूर्व में चामुण्डराय के भ्राता नागवर्मा की हत्या की और "गंगारबंता " एवं "चलाण्डका गंगा " जैसी उपाधियाँ धारण की थी. अपने भुज विक्रम और इन विद्रोहों के सफलता पूर्वक दमन के लिए चामुण्डराय को "समर परसुराम " की उपाधि दी गयी। अपने असाधारण शौर्य और वीरता के बल पर चामुण्डराय ने विद्रोहों का दमन कर राजमल्ला चतुर्थ को सिंहासनारूढ़ किया। उनकी जैसी स्वामिभक्ति और वीरता का उदाहरण भारतीय इतिहास में बहुत कम ही है. चामुण्डराय ने प्रभुवनवीरा को बालेयुर के युद्ध में पराजित कर गोविंदराजा को किले में प्रवेश करवाया जहाँ गोविंदराजा ने किले पर अपना आधिपत्य जमा लिया। चामुण्डराय ने राजा, बासा , शिवारा , कुणका और अन्य सामंतों को दंड दिया जो कि गंगा शासन से अपने आप को अलग कर सम्प्रभु होना चाह रहे थे। युद्ध में महान वीरता और साहस के लिए चामुण्डराय को कई उपाधियाँ दी गयी जिन में "वीरा मार्तण्डा ", "रणरंगासिम्हा", "समर धुरंधर " , "वैरीकुल कालदंडा " , "भुज विक्रम " और " भटमारा " जैसी प्रसिद्ध है. एक महान योद्धा और राजनेता होने के बावजूद ये अपना खाली समय विद्वानों और कवियों के साथ व्यतीत करते थे। इन्हे साहित्य और कला में भी रुचि थी। चामुण्डराय ने स्वयं चामुण्डराय पुराण की रचना की जिसमे जैन धर्म के 63 शलाका पुरुषों का वर्णन है. चामुण्डराय की यह कृति कन्नड़ साहित्य में एक अलग स्थान रखती है। चामुण्डराय कन्नड़ के आदि कवि पम्पा के समकालीन थे। चामुण्डराय की कृति कन्नड़ , प्राकृत और तमिल शब्दों से अलंकृत है और इसे आज भी कन्नड़ साहित्य में उत्कृष्ट श्रेणी का माना जाता है. चामुण्डराय कन्नड़, प्राकृत और तमिल भाषाओँ में निष्णात थे। इनकी कृति की रचना इन्होने ईस्वी सं 978 में की और इस से यह ज्ञात होता है कि इनके गुरु का नाम अजीतसेन भट्टारक था। सं 982 में गोम्मटेश्वर की प्रतिमा की प्रतिष्ठा कर इन्होने राजमल्ला चतुर्थ से "राय " की उपाधि धारण की। इनके पुत्र जिनदेवा ने श्रवणबेलगोला के चन्द्रगिरि पर्वत पर अपने पिता चामुण्डराय की याद में चामुण्डराय बस्ती का निर्माण करवाया। यह मंदिर आज भी द्रविड़ शैली में चन्द्रगिरि पर्वत पर स्थित है. इस मंदिर का १२ शताब्दी में जीर्णोद्धार भी हुआ है. जब तक चामुण्डराय मंत्री और सेनापति थे तब तक विदेशी आक्रमण को सफलता पूर्वक दबाया जाता रहा और गंगा शासकों की संप्रभुता बनी रही. चामुण्डराय की मृत्यु 989 ईस्वी में हुई और इनकी मृत्यु के साथ ही गंगा एकता और शक्ति का लोप हो गया |

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