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Gwaleshwar temple ; A Parmar era Jain temple at Oon,Khargone, MP



ग्वालेश्वर मंदिर :- उत्तर परमार कालीन ग्वालेश्वर जैन मंदिर उन नगर से दक्षिण दिशा में एक किलोमीटर से कम की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है जिससे यह दूर से ही नज़र आ जाता है। यह मंदिर आज भी पूर्ण अखंडित अवस्था में विद्यमान है जबकि मध्य काल में भी यह मुस्लिम आक्रमण कारियों से सुरक्षित रहा। ग्वालेश्वर मंदिर के सामने की पहाड़ी पर पांच जैन मंदिर विद्यमान है जो कि यहाँ से मोक्ष प्राप्त सुवर्णभद्र आदि चार मुनियों की याद में बनाये गए है।

ग्वालेश्वर मंदिर का इतिहास :- ग्वालेश्वर मंदिर 16 वे जैन तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ को समर्पित है और आम जन भगवान शांतिनाथ को ग्वालेश्वर के रूप में पूजते है। इस मंदिर के ग्वालेश्वर नाम पाने के पीछे भी एक किवदंती है। ऐसा कहा जाता है कि ग्वाले और चरवाहे अपने पशुओं को चराते हुए इस मंदिर पर शरण लेते थे और पहाड़ी पर स्थित होने के कारण अपने पशुओं पर नज़र भी रख सकते थे। ग्वाले भगवान शांतिनाथ की प्राचीन प्रतिमा की भक्ति कर इच्छा पूर्ति भी पाते थे।

ऐतिहासिक रूप से ग्वालेश्वर मंदिर का निर्माण लगभग 12 -13 वी शताब्दी ईस्वी में हुआ। इस मंदिर का निर्माण मालवा के उत्तर कालीन परमार राजाओं के राज्य काल में हुआ था। यह मंदिर आज भी अखंड़ित है और एक से अधिक जीर्णोद्धार को प्राप्त हुआ है। शांतिनाथ कुंथुनाथ और अरहनाथ भगवान की प्रतिमाएं सं 1206 ईस्वी में प्रतिष्ठापित है। इस मंदिर का एक जीर्णोद्धार 1936 ईस्वी में हुआ था।

ग्वालेश्वर मंदिर का वास्तु :- ग्वालेश्वर मंदिर एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है जिस पर मुख्य मंदिर तक जाने के लिए कुछ सीढ़िया है। यह सीढ़ियां एक स्वागत द्वार से प्रारम्भ होती है जो कि तीन लोक की आकृति में बनाया गया है। यह नवीन निर्माण है जो कुछ वर्षो पूर्व हुआ है और स्टील की रेलिंग भी लगवा दी गयी है। यह सीढ़िया हमे मुख्य मंदिर परिसर तक ले जाती है। मुख्य मंदिर परिसर में एक मानस्तम्भ है जो कि ग्वालेश्वर मंदिर के मुख्या द्वार के ठीक सामने है।

मंदिर के मुख्य द्वार के दोनों बगल में दो मंदिर विद्यमान है जिसमें बाँयी तरफ का मंदिर महावीर स्वामी और दांयी तरफ का मंदिर भगवान चन्द्रप्रभु को समर्पित है। इन मंदिर की प्रतिमाएं अपेक्षा कृत नवीन है जो कि उन पावागिरि के आधुनिक काल में एक तीर्थ क्षेत्र के रूप में विकास होने के बाद विराजमान की गयी है।

ग्वालेश्वर मंदिर के तीन द्वार है जो की क्रमशः पूर्व,उत्तर और पश्चिम दिशा में विद्यमान है। इन सभी द्वारों पर द्वार मंडप भी है जो कि परमारकालीन मंदिरों की शैली में दिखाई देता है। इस मंदिर का निर्माण भी भूमिजा शैली में ही हुआ है। पूर्व और पश्चिम द्वारों तक भी सीढ़ियां है जो की मुख्य मंडप तक ले जाती है।

मंडप एक वर्गाकार प्रकोष्ठ है जिस पर एक गोलाकार गुम्बद की संरचना है जो कि स्तम्भों पर टिकी हुई है। मंडप से मुख्य गर्भगृह तक जाया जा सकता है जिसमे प्राचीन परमार कालीन जैन त्रितीर्थी शांति कुन्थु और अरह विराजमान है। मंडप में दांयी और बांयी तरफ दो वेदियाँ विद्यमान है जो की सम्भवतः नवीन निर्माण है और इन वेदियों में कई प्राचीन परमार कालीन जैन प्रतिमाएं विराजमान है। सम्भवतः ये जैन प्रतिमाएं और प्राचीन चरण इसी उन ग्राम से प्राप्त हुए है। प्राचीन तोरण का भाग, सम्भवनाथ भगवान और प्राचीन चरण इन वेदियों का मुख्य आकर्षण है।

प्राचीन शांति -कुन्थु -अरह की प्रतिमाएं :- गर्भगृह में विराजमान शांतिनाथ कुंथुनाथ और अरहनाथ भगवान की प्रतिमाएं काले आग्नेय पाषाण से निर्मित है और भगवान शांतिनाथ इस मंदिर के मूलनायक भगवान है। यह गर्भगृह एक गहरी संरचना है जो की मंदिर के मंडप से लगभग 10 फ़ीट नीचे स्तर पर है। इसमें उतरने के लिए सीढ़ियां भी है। भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा लगभग 12 फ़ीट ऊँची है और कुंथुनाथ और अरहनाथ भगवान की प्रतिमाएं 8 फ़ीट ऊँची है। इन प्रतिमाओं के पाषाण पर वज्र लेप किया गया है जिसके फलस्वरूप इनकी चमक बरक़रार है। यह प्रतिमाएं कायोत्सर्ग मुद्रा में ध्यानरत है और जिनेन्द्र भगवान के मुख कमल पर पवित्रता और शांति का भाव परिलक्षित है। इन प्रतिमाओं के ऊपर छत्र भी विद्यमान है और चंवर धारक भी उकेरे गए है जो भगवन के घुटने तक की ऊंचाई तक है।

Gwaleshwar temple :- Gwaleshwar temple of later parmara era is situated about less than a kilometer from Un town in southward direction and it was erected on a small hill which is clearly visible from distance. The temple is intact after so many tidy winds of Islamic offenders during medieval period. On the opposite hill of the Gwaleshwar temple there are 5 small Jain shrines to commemorate the liberation of Suvarnabhadra etc. ascetics.

History of Gwaleshwar temple:- Gwaleshwar Temple is dedicated to 16th Jina savior Lord Shantinatha. The temple got its name which has a unique reason behind it. It is said that during medieval time, shepherds and cowherds used to get shelter in this temple during their daytime and they were devotee to Lord Shantinatha.

Historically; the Gwaleshwar temple was constructed during 12-13th century AD. The temple was constructed during reign of later Parmara sovereign of Malwa region. The temple has been intact and perhaps gone through more than one renovation. The colossal image of Lord Shantinatha is dated to 1206 AD.The temple got renovation in 1936 AD.

Architecture of Gwaleshwar temple :- Gwaleshwar temple is situated on a small hill which contains stairs starting from road passing near to the hill. The stairs leads us to the temple premise. The temple premise has initially a Maanstambh which is just in front of temple. There are two other small shrines on left and right side of the main entrance to gwaleshwar temple. The left one is dedicated to Lord Mahaveera and right one has image of Chandraprabhu. These Images are comparatively newer and perhaps installed after development of this place as a Jain pilgrimage center in modern age.

The Gwaleshwar temple’s has three entrances with dwar mandapas which are situated in east, west and north directions. East and west entrances also have stairs which leads us to mandapa of the main temple.

Mandapa is a square space which has a circular dome supported by pillared structure. The Mandapas leads us to holy of holies containing three ancient Parmara era sculpture of Shanti-Kunthu-Arah.

There are two vedis situated on right and left side of mandapa containing several Parmara era sculptures along with ancient foot prints. Sculpture of Sambhavnath, footprints and part of ancient torana are main attraction of these vedis.

Ancient Sculpture of Shanti-Kunthu-Arah :- Sanctum or Garbhagriha of the Gwaleshwar temple contains three colossal images of Teerthankar trio as Shantinatha,Kunthunatha and Arahnatha. The sculptures are sculpted with black basalt rock and Shantinatha is paramount lord of this temple.

The sanctum or Holy of holies is a deep structure and about 10 feet deeper than mandapa. Colossal image of Lord Shantinath is about 12 feet high and Kunthunath and Arahnath are of about 8 feet height. The images are highly polished and great specimen of Parmara art. The Teerthankara sculptures are in Kayotsarga posture with serenity, tranquility on faces. Jina savior sculptures are depicted with Canopies over head, Whisk beares and such pratiharyas.

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